आठवीं शती में, अद्वैत के आचार्य शंकर ने भारत के विचरणशील संन्यासियों को एक व्यवस्थित भ्रातृ-मण्डल में संगठित किया — दस नाम, चार पीठ, एक ही आत्मा।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ॥ "ब्रह्म ही सत्य है, जगत् मिथ्या है; जीव ब्रह्म से भिन्न कुछ भी नहीं।" — अद्वैत वेदान्त का बीज-वचन आदि शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध
संन्यास — विधिवत् त्याग — उपनिषदों जितना ही प्राचीन है। किन्तु आदि शंकराचार्य (परम्परा से 8वीं शती ई.) के समय तक संन्यासी-जगत अनगिनत स्वतन्त्र धाराओं में बिखर चुका था। शंकर की प्रतिभा जितनी दार्शनिक थी, उतनी ही संगठनात्मक भी: उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर अपने भाष्यों के साथ-साथ उन्होंने संन्यासियों को संगठित किया दस नामधारी सम्प्रदायों में — अर्थात् दशनामी — जिनमें से प्रत्येक भारत की चार दिशाओं में स्थापित चार मठों में से किसी एक से सम्बद्ध है।
स्वामीजी की अपनी शाखा, गिरि ("पर्वत"), हिमालय-स्थित ज्योतिर्मठ की उत्तर-पीठ से सम्बद्ध है — तप, एकान्त और अचल शिखर की दिशा।
परम्परा संन्यास की एक आरोही सीढ़ी को मान्यता देती है — कुटीचक (कुटी में रहने वाला), बहूदक (अनेक जलतीर्थों का पथिक), हंस (हंस, विचरणशील ध्यानी) तथा परमहंस (परम हंस, ब्रह्म में लीन) — और परवर्ती साहित्य इनमें जोड़ देता है तुरीयातीत और अवधूत उनके लिए जो समस्त बाह्य चिह्नों से परे हैं। दशनामी संन्यासी दीक्षा के समय नया नाम पाता है, गृहस्थ जीवन के अनुष्ठानिक बन्धन काट देता है, और उसके पश्चात् आत्म-साक्षात्कार तथा समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए जीता है।
इतिहास ने यह भी माँगा कि कुछ संन्यासी धर्म की रक्षा हेतु शस्त्र भी धारण करें। दशनामी शरीर से ही वे योद्धा-संन्यासी सम्प्रदाय उठे — नागा — जो अखाड़ों (सेना-दल अथवा मल्ल-भूमि) में संगठित हुए। इनमें श्री पञ्चदशनाम जूना अखाड़ा सबसे प्राचीन और सबसे बड़ा है। दोनों पक्ष एक ही देह हैं: शस्त्र (तलवार) ने रक्षा की शास्त्र (ग्रन्थ) की, ताकि यह ज्ञान हम तक अखण्ड पहुँच सके।